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Showing posts from November, 2019

किस को दोष दूँ।

किस को दोष दूँ। किस किस को दोष दूँ मैं। किस किस पर लाँछन लगाऊँ। समाज के हर हिस्से में खोट हैं। हर काम अधूरा है किस किस को जिम्मेदार बनाऊँ। क्यों आज सिर्फ उनके भद्दे नज़रिये और कृत्य को देखूँ। उनकी परवरिश कर रहे समाज पे क्यों न ऊँगली उठाऊँ क्यों ना उन्हें आज आईना दिखाऊँ। उपहास देखते देखते बड़ा हुआ हैं वो समाज में नारी का। थप्पड़, भद्दे कटाक्ष, नारी पर सुन बड़ा हुआ हैं। किशोरावस्था में वही कटाक्ष कर नारी पे वो दोस्तों की मंडली में मनोरंजक हुआ हैं। गलतियों पे बचा कर, शिकायत कर्ताओं को चुप करा कर घरवालों ने उसको शय दिया हैं। तभी तो उसने आज ये कदम लिया हैं। किस किस को दोष दूँ। किस किस पे लाँछन लगाऊँ। उतार फेंकू न्यायमूर्ति की आँखों की पट्टी और तलवार पे उसकी आज धार लगाऊँ। न्याय बाँट रहे न्यायाधीशों की आँखों पर क्यों ना ये पट्टी बँधाऊ।  किस किस को जिम्मेदार ठहराऊँ। मानवता को करती शर्मशार जाति का किस अदालत में मुकदमा चलाऊँ। तर्क-वितर्क कर, बुद्धि से, ज्ञान से, किसको दोषी कहलाऊँ। किसको और क्या सजा सुझलाऊँ| क्या करूँ, सजा मुकम्मल मैं इनके लिये अब। जो फिर से ऐसा कृत्य...

Immortal

Immortal Nothing is immortal in this world except emotions. We read them in form of words in the books. We write them in form of words on paper. We get bound to love, we get bound to hate, As we can feel them. We spread them to make the surroundings joyful. We receive them when we meet someone. We spread them when we talk to someone. We are not only the ones who can feel them. Still, we are the most unsatisfied creatures, Yes we are on the earth. So, love everything, everyone to get love in return.