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बस डटे रहना

 कुदरत असहनीय दर्द देती हैं, की कोई भी इंसान टूटने लगे, तो मलहम भी लगाती हैं।  की ये उम्रभर भी कम लगने लगती है खुद को संभाले रखने के लिए,खुद को बनाने के लिए। तुम भटकते रहते हो, फिरते रहते हो, इधर-उधर किनारे की तलाश में  जब याद करो जमाने भर के लोगों को और कोई ऐसा न मिले, जिसको मन में चलते तूफान बयां कर सको। तब तुम हर किनारा छू लोगे । तुम खुद एक समुद्र बनोगे । तुम महसूस करोगे कि तुम्हारे भीतर का वो तूफान जैसे एक शांत मधूरमय हवा हो। बस तुम डटे रहना  सांस मत छोड़ना यही रुके रहना  उस दिन का साक्षात्कार करने के लिए  देखना ये समां एक दिन जरूर बदलेगा  और वो वही लम्हा होगा जिसकी तुम्हें तलाश थी,  तुम बस डटे रहना