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Showing posts from March, 2019

Tribute to my spiritual guru " Basil Braaf" (Bhante)

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Inspiration I see the bright light of morning in you Which I saw in my life in anybody I wish I could give a head kiss too. Which I never felt in my life I am afraid that I will dirt you Which I never thought in my life Hope! I will marge in nature like you. Wish I could give you a name. But that will be an injustice to you I will say nature has adopted you alive. I have written the words. Which I never dedicated to anyone in my life Oh! You are endless, enormous... How to finish it I have low words and tiny mind... Where to end I am just a contemptible creature to write. Oh! I was fooled a lot, human is a part of nature; nature is not a part of human life. You have taught me which I never got taught in my life.

धर्म

कुछ पत्थरों पे राम लिखा था और कुछ पे अल्लहा। मैं बेघर बेचारा क्या करता चुग लिए पत्थर सारे और बना लिया आसिया अपना। मेरे ही जैसे दो बेचारे भटक गए थे रास्ता अपना। एक था वाहेगुरु और एक था ईशु माता मरियम का बच्चा। बना लिया उन्होंने भी मेरे ही आसिया को ढिकाना अपना। रह रहे हैं चारो अब, एक ही छत के नीचे औऱ निभा रहे हैं धर्म अपना अपना। भोजन चार पहर बनता हैं एक ही आंगन में, कभी शाकाहारी तो कभी मांसाहारी एक पहर सर्वाहारी भी पकता हैं। शाम को मधुरस पान का दौर भी चलता हैं। नॉकारी ज्यादा कमा कर नही देती, बर्तनों की कमी हैं घर में फिर भी मिल बाँट कर चला लेते हैं काम अपना अपना। एक पहर का भोजन तो मिल ही जाता हैं हर वक्त रूखा सूखा ही सही पर कुछ ना कुछ तो आगंतुकों को दे ही दिया जाता हैं। पैगम्बर हो फरिस्ता हो या दूत आने वाले हर शख्स का मान रख लिया जाता हैं।। रह रहे हैं चारों ईश्वर, ईशु, गुरु और अल्हा। मालिक को याद चारों पहर किया जाता हैं घर में कभी याद करता हैं ईश्वर कभी ईशु कभी गुरु तो कभी अल्हा। एक पहर पूजा जाता हैं राम, तो दूजे पहर इबादत करता हैं अल्हा, तीजे पहर गुरुबाणी तो रहता हैं आ...

नारी दिवास की एक याद

एक महफ़िल में गया "नारी दिवस" आज जहाँ मनाया जाना था। लोगो को देखा संकल्प लेने दिलाने का रिवाज करते। सुकून मिलता दिल को,मगर हौंसला अवज़ाई और संकल्प दिलाने वाली एक महिला के शब्द सुनकर स्तभ् रह गया और अनायास कुछ पंक्तियों ने मेरे चित मन को घेर लिया। वही कुछ पंक्तियाँ आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। संकल्प अगर कोई लेना या दिलवाना ही चाहते हो तो बस इतना कह दो। मेरी सहेलियों ज़रा आईना देखो। ये बात कहता हैं भूत की जहाँ तूने युद्ध-ए-मैदान जीते हैं ये कहानी सुनाता हैं वर्तमान की जहाँ तू आसमा तक जा पहुंची हैं। ज़रा आईना देखो गौर से, देखो खुद को, और खुद को पहचानने की ज़हमत तुम कम से कम आज उढा लो। जहाँ उपहास कर रहे नादान तेरा मर्दानी का चोला ओढ़ कर। युद्ध भूमी की दहाड़ रह रही हैं आज गलियों,घरों की चीख बन कर। नोंच रहे हैं गिद्ध तुझे समाज से कवच मर्द का लेकर। पहचान ले तू खुद को आज इस से पहले की तू बन जाये इतिहास। रह ना जाये कही तू बस बनकर, पीछे के एक बन्द कमरे से आती करहाने की आवाज़। 

रिस्ते लिबास नही होते

क्या करे मोह्तार्मा रिस्ते लिबास नही होते.. जो एक पल में उतार कर फेंक देते.. होते भी हैं अगर आपके हिसाब से.. तो हमे उन तमाम लिबासों से मोहबत है बेइंतहां जो तुम्हारी यादो के धागो से बुने हैं और.... जिन पे धब्बे हैं तुम्हारे शिकवें शिकायतो के.. उन धब्बों को धोने की कोशिश की है जब जब.. तब तब हमारी उन कोशिशों ने उन्हें और गहरा बना दिया शायद.. तभी तो मांग लिया तुमने हमसे आज हमारी साँसों का सहारा वो मफलर तुम्हारा जो तुम भूल आयी थी.. उस किनारे पे जहां हमने वो सर्द रात बितायी थी.. अनजान से बैढे थे उस वक़्त,,वक़्त का कुछ पता ही ना लगा.. कब हम-तुम साथ हो लिए और इतने लम्बे चल आये की आज रास्ते अलग-अलग हो लिए..

कविता लिखने का सफर

लोग कहते हैं मैं कविता लिखता हूँ। ओर मुझे यकीन नही होता उनकी बातों पे मैं तो बस मेरे नज़रिये से जन्मे ख्यालातों को उकेर देता हूँ सफेद पन्नों पे शुरुआत भी हुई इसकी यू की जब ख्यालातों को सुनाने की कोशिश की तो जिसने समझा वो रो दिया। जिसने ना समझा वो हँस दिया। कुछ ने मशवरा देकर छोड़ दिया। अब किसी से उम्मीद नही समझे जाने की ना ही कोई कोशिश हैं समझाने की। बस इसलिए इन सफेद पन्नों को चुन लिया हैं। चुप चाप सह लेते हैं बोझ मेरे खयालातों का। इसलिए इन्हें ही हमसफर बना लिया हैं अब उगता हैं जो भी डाल देता हूँ इनके कन्धों पे बस अब मोहोब्बत सी हो गयी हैं इनसे ऐसा हमराही ना मिलता शायद लाख ढूढ़ने पे जो सुन लेता हैं मेरी कहानी और बदले में कुछ नही कहता समा लेता हैं मेरे दर्द को अपने अंदर ओर तनिक भी शिकन नही लेता।

शहर

हर रोज़ ये भगता शहर सोता है सपनोंं की कब्र मैं हर सुबह उढता है फिर से हज़ारों सपनों को बाहों में समेटे दिन ढलते ढलते कुछ को ही पूरा कर पता है बस हर शाम फिर से कब्र सज जाती हैं आलिंगन मैं लेने को ये सोता नहीं, हर रात रिस्तो के गिरते मायिनो से तपन लेता है जल जाता है हर क़तरा सुबह उसी गंध में सांस लेता है सपनों की लड़ाई शुरू होती है ओर हर चेहरा कालिख़ से पूत जाता हैं। लिए जले रिस्तो की खाक माथे पे सपनों की दौड़ में कही खो जाता है। रौंदता चला जाता है अवषेशों को जो कल रात बच गए थे ज़मी पे जलने से देखता है चारों तरफ तो खुद से ही खुद को घिरा पता है पहुँच कर मंजिल पे अपनी फिर उन रिस्तो को ढूढ़ता है झुठला आता हैं ठूकरा आता हैं जिन्हें अपनी इसी मंज़िल को पाने के ख्वाब में।

सवाल

क्या वजह होगी, तेरे बार बार यूं खता हो जाने की? खामोश बेरुखी से यूं बार बार लफ़्ज़ों को सुनने की? तू भी बोल, तेरी खामोशियां तो इशारे बहुत करती है, एक अर्से से आदत नहीं मुझे, ये सवाल बहुत करती है। इन धुंधली यादों को, तेरे साथ का एक चश्मा चाहिए, अंदाज़े अब काम नहीं आते, इन्हें अब तेरे अल्फ़ाज़ चाहिए। याद हैं तो बस कुछ मेरी ज़िद और तेरा वो समझाना, मुश्किल ही लगता है अब मेरा इन यादों से बच पाना। मेरी जिद तुम्हें पीछे छोड़ आई, इंतज़ार रहा आने का, किस्मत के आगे ज़ोर न चला था, फिर से तुझे पाने का। बिछड़ कर भी तुझसे, कुछ धागे जुड़े हुए से लगते हैं, उम्मीद के घर में, आज भी कुछ सपने तेरे ही दिखते हैं। आओ, उन लम्हों को फिर से बुन लेते हैं हम मिल कर, जंग नहीं यह जिंदगी है, आओ संवार लेते हैं इसे साथ मिल कर।

अलविदा

चलो अब अलविदा कह दो.... रुको ढहरो एक पल एक अंतिम दुआ पढ़ लूँ.... इन साँसों के रुक्सत लेने से पहले.... तेरी हर दुआ कुबूल हो, तमाम सपने जो तूने देखे हैं वो पूरे हो!! फिर उन सपनो मैं मेरी तस्वीर चाहे अधूरी हो.... एक क़तरा भी आँसू ना गिरे तेरी आँख से... इबादत में, मैं यही माँगता हूँ  तुझसे बस मेरी ये अंतिम दुआ कुबूल हो... मंज़िल तेरी चाहे तुझसे कितनी भी दूर हो, पर तू ना कभी ख़ुशी से मरहूम हो... मेरी इबादत की ये अंमित दुआ कुबूल हो...

खामी

ज़िंदगी के उन पन्नों का मैं क्या ज़िकर करूँ अल्फ़ाज़ों मैं! जो मेरी हक़ीक़त बांया करने से कतराते हैं!! नासमझने वालों की क्या शिक़ायत करूँ मैं अब तुमसे! तुम्हें भी एक दिन उन्हीं में शामिल हों जाना हैं!! ज़िक्र कर भी दूँ तो ख़ुदगर्ज़ समझा जाऊँगा! किसी उद्देश्य की मोहोताज़ नहीं मेरी उपस्थिति,फिर में तुम्हें ये कभी नहीं समझा पाऊंगा!! एहसास जो तुम्हारे यहां होने से हैं! उसे अल्फ़ाजो मैं ना बयां कर पाऊंगा!! समझना तुम्हें ही होगा,बस इतनी ही दरखास्त कर पाऊंगा!! ना भी समझ पायी तो शिक़ायत नहीं तुमसे! इस बहाने ही सही कम से कम तुम्हें, अपनी उपस्थिति के वजह के पास ले जा पाऊंगा!! बस अब इसलिए दरकिनार कर रहा हूँ ख़ुद को तुमसे, तुम्हारे इस ईशारे से!! इसके अलावा शायद मैं कुछ ओर ना कर पाऊंगा!!! 

ज़िन्दगी का तोहफा

ज़िन्दगी ने खामोश रहना सीखा दिया है!! बचपना हमारा हमसे चुरा लिया हैं! कुछ दर्द भरी यादों ने तोह कुछ ढोकारों से लगे घावों ने,अब हमें लड़खड़ाना भुला दिया हैं! बेपरवाही की आदतों को ज़िन्दगी ने अब हमसे चुरा लिया हैं! कुछ लिखना और कुछ पढ़ना सिखा दिया हैं!! पर हमसे हमारा बचपन चुरा लिया है!! लोगों के लिए पद चिन्ह हमे इस ज़िन्दगी ने बना दिया है!! अपार सम्मान इस समाज में दिला दिया हैं !!! पर हम से हमारा बचपन चुरा लिया है!!

समझाइस

ये पलकें भारी रहतीं हैं हर रात नींद से कोसों दूर थक कर मुझसे सवाल करतीं हैं!!! क्यों उलझें रहते हों तुम इस मतलाबी दुनियां की बातों में क्यों खुद से इतने सवाल करते हों! क्यों खुद से इतनी बातें करते हो,हर रोज़!! कल खुद को कैसे छुपाना हैं दुनिया से,इसी का अभ्यास करतें हो!! क्यों ख़ुद से इतना डरते हो!! क्यों रोज़ रोज़ ये अभ्यास करतें हो!! क्या मिला जो तुम्हारा नही हैं क्या खोया जो तुम्हारा था!! सब पराया हैं! तुम ख़ुद,ख़ुद के नहीं एक वक़्त के बाद ख़ुद को पहचानने से इनकार कर दोगे!!

खामोशी भरे जवाब

अहसास बयां करे जो हमारा,उन शब्दों को भीतर दबा लिया है हमने... उन जीतने हारने के क़िस्सों से अब किनारा कर लिया है  हमने... डरते हैं उन क़िस्सों से अब रूबरू होने से,उन क़िस्सों ने बहुत कुछ छीना है हमसे.... कुछ क़ीमती नहीं अब हमारे पास दाव लगाने को,ख़ुद को भी हम हार गये हैं तुमसे...पहली ही मुलाकात में.. घाव दिखाने से कतराना भी ठोकरों सेे सीखा हैं हमने... अब तो ना पूछोगे शायद तुम भी कभी क्यों गुमसुम रहते हों... हर वक़्त क्या है वो जो सोचते रहते हों.... क्यों आँखों मे लिए ढेरों सवाल हमें तकते रहते हो... क्या है वो जिसे अपनी मुस्कुराहट से हर वक़्त ढकते रहते हो..

रुहू का सहारा

हर दिन पराया हो जाता हैं इन बहते आँसुओ के साथ.. वो शक़्स जिसे इस जिस्म का अंग माना था..!! यादों की दीवारों को धोते ये बारिश से बहते आँसू.. एक घड़ी भी रुकने का नाम नहीं लेते... याद गहरी हो कोई या अकेलेपन का साथ हो तोह आंखों से आज़ाद हो लेते हैं... खुशकिस्मत हैं ये आँसू मरने से पहले कम से कम एक बार आज़ादी की हवा में सांस लेते हैं।।। इस क़ैद रुहू को तोह ना मरने की आज़ादी हैं ना जीने की... जब जब उम्मीद करती हैं आज़ादी की, हर उम्मीद बेरहमी से कुचली जाती हैं।। मलहम लगा देते हैं आँसू इस पर यादों को धो कर।। हर वक़्त बेचैनी रहती हैं फिर भी ना जाने क्यों ये आज भी उम्मीद नही खोती!!

चित्त की आवाज़

जाओ चली जाओ अब कुछ नही बचा, सब जल गया उस रात आग में।। अब ओर कुछ नही यहाँ जलने जलाने को।। अध जले यादों के जिस्मों से उठती धुआँ में अब कुछ साफ भी नही दिखता। इस धुयें के कारण ही अब यकीन मेरा, हर किसी पर नही बनता। तुम्हारी कोई खता नही इसमें,मुझे ही टकराने की आदत थी बार बार। इस धुयें ने आदत बदल दी अब, कदम आगे लेने से पहले भावनाओं को टटोलने की कोशिश एक बार जरूर करता हूँ। कई बार सफलता मिलती हैं, कभी कभी गुरुर का सामना भी करता हूँ। खुद ही खुद को झूठला देता हूँ, सच को नकार देता हूँ। कई दफ़ा मांफी भी मांग लेता हूँ। उनकी नासमझी के लिए उन्ही से। मैं तोह बस रिश्तों की कीमत समझता हूँ गुरुर तो मेरा भी किसी से कम नही। शिकायत नही किसी से अब मुझे, इस धुंए में भी मैं अब खामोशी से साँस लेता हूँ।।।

पैग़ाम

पैगाम मांस के लोथड़ों की कमी नही हैं शहर में।। कोड़ियों के दाम बिकते हैं।। इश्क़ किया था हमने तुमसे.... चाहत बस जिस्मानी होती कोई, तोह हम भी जेब टटोल लेते अपनी... उन बाज़ारों से हम भी खरीद लेते सुकून अपना.... अगर सुकून कोई बेच रहा होता वहाँ पे...,,,तो ज़ख्मो से पीड़ितो की आवाज़ ना आती,माहौले के उस कोने से हर रोज़। भरे माहौले में तूने इश्क़ को मेरे काफिस में खड़ा कर डाला।। पहना कर मेरे इश्क़ को हवस का चोला... मेंरे पाक इश्क़ को तूने नापाक कर डाला।। वफाई का ताज हर किसी के सर पर नही फब्ता। शुक्र हैं एहसास हैं मुझे इसका। नही तोह बाहर का ये नज़ारा कुछ और ही होता। तू रो कर भी ना छुपा पाती अपनी प्यास को। जो हैं हश्र मेरा तेरा उस से भी बुरा होता।। अगर में बेवफा होता।

मौत एक नई जिंदगी

नई जिंदगी मौत के बाद भी ज़िन्दगी होती है। जिस सुकून भारी नींद की आस होती हैं वह मौत के बाद ही साथ होती हैं मौत के बाद की ज़िन्दगी बहुत ख़ास होती हैं ज़िन्दगी की डोर को किस मजबूती के साथ थामा था। मौत के बाद की ज़िंदगी वो बांया होती हैं कोई मरता नही कभी, मौत अंत नहीं, यह तोह एक नई शुरुआत होती हैं मौत के बाद भी ज़िन्दगी होती हैं, ओर बहुत खास होती हैं। हर रोज़ यहाँ स्कूल की घंटी की तरह गिरजाघर की घंटी होती हैं। शिक्षक की जगह पादरी होता हैं, होमवर्क में पाप पुण्य की कहानियों की बात होती हैं। शिस्टाचार सीखाने का भी प्रयास होता हैं यहाँ। ईशु का ज्ञान होता हैं, शिशु का निर्माण होता हैं।। शिकायतों पर सुनवाई भी होती हैं यहाँ। फिर भी मौत के बाद कि ज़िन्दगी बहुत शांत होती हैं। रिश्तों की कब्र होती हैं यहाँ। फिर भी ज़िन्दगी बहुत आसान होती है। हां मौत के बाद भी ज़िन्दगी होती हैं। ओर बहुत खास होती हैं।

Propose

Propose You are young beautiful and alive I don't want you to fall for my desire But I want you to blush Laugh loud and make your alone shore fill I don't know how long I can be here Wish I keep you with me But it is impossible for you Pebbles, society and many more You are huge enough to bear the pain And feeds the feeders for long

उम्मीद

उम्मीद (जीने का एक सहारा) जिस्म धधक रहा हैं आग सा। दोष तुझे दूँ या ये दोष मेरा हैं तय करने को कोई लम्हा मुनासिफ नही लगता  बैठता हूँ जब कलम लेके,उन बिसरी यादों को इन पन्नो पे सजाने को, तो कोई शब्द उपरोक्त नही लगता। लगती हैं ये जिंदगी भी अब कम तुझे भूल जाने को क्योंकि इस धधकते जिस्म पे अब कोई मुखौटा नही टिकता मुखौटों की मियाद कम हो गयी हैं वक़्त के साथ दिल का ये दर्द अब छुपाने पर भी नही छुपता तेरे दामन में जगह मिल जाये सिर छुपाने को इस उम्मीद का एक दिया भीतर जला रखा हैं ना जाने कब नज़र पड़ जाए तेरी, इस उम्मीद के सहारे इस जिस्म को लकड़ियों से बचा रखा हैं।

God And Seed

Oh dear squirrel you are god No one has time in the watch You collect the dry seeds from the ground Saw them in the soil before the spring come You give new life to draught seeds You help to make the earth green You examine the seed and understand his need Oh dear squirrel you are the god Save me as you save the seed I fall from the tree to grow new within me Take me saw where you feel  I will feed you when I will be a tree Search a place for me There are still some breath left in me Choose me before I have been burnt by the heat Give me my place where I can breath Oh dear god choose me to become a tree.