खामी

ज़िंदगी के उन पन्नों का मैं क्या ज़िकर करूँ अल्फ़ाज़ों मैं!
जो मेरी हक़ीक़त बांया करने से कतराते हैं!!

नासमझने वालों की क्या शिक़ायत करूँ मैं अब तुमसे!
तुम्हें भी एक दिन उन्हीं में शामिल हों जाना हैं!!

ज़िक्र कर भी दूँ तो ख़ुदगर्ज़ समझा जाऊँगा!
किसी उद्देश्य की मोहोताज़ नहीं मेरी उपस्थिति,फिर में तुम्हें ये कभी नहीं समझा पाऊंगा!!

एहसास जो तुम्हारे यहां होने से हैं!
उसे अल्फ़ाजो मैं ना बयां कर पाऊंगा!!
समझना तुम्हें ही होगा,बस इतनी ही दरखास्त कर पाऊंगा!!

ना भी समझ पायी तो शिक़ायत नहीं तुमसे!
इस बहाने ही सही कम से कम तुम्हें, अपनी उपस्थिति के वजह के पास ले जा पाऊंगा!!
बस अब इसलिए दरकिनार कर रहा हूँ ख़ुद को तुमसे, तुम्हारे इस ईशारे से!!

इसके अलावा शायद मैं कुछ ओर ना कर पाऊंगा!!! 

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