रुहू का सहारा

हर दिन पराया हो जाता हैं इन बहते आँसुओ के साथ..
वो शक़्स जिसे इस जिस्म का अंग माना था..!!
यादों की दीवारों को धोते ये बारिश से बहते आँसू..
एक घड़ी भी रुकने का नाम नहीं लेते...
याद गहरी हो कोई या अकेलेपन का साथ हो तोह आंखों से आज़ाद हो लेते हैं...
खुशकिस्मत हैं ये आँसू मरने से पहले कम से कम एक बार आज़ादी की हवा में सांस लेते हैं।।।
इस क़ैद रुहू को तोह ना मरने की आज़ादी हैं ना जीने की...
जब जब उम्मीद करती हैं आज़ादी की, हर उम्मीद बेरहमी से कुचली जाती हैं।।
मलहम लगा देते हैं आँसू इस पर यादों को धो कर।।
हर वक़्त बेचैनी रहती हैं फिर भी ना जाने क्यों ये आज भी उम्मीद नही खोती!!

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