उम्मीद
उम्मीद
(जीने का एक सहारा)
जिस्म धधक रहा हैं आग सा।
दोष तुझे दूँ या ये दोष मेरा हैं
तय करने को कोई लम्हा मुनासिफ नही लगता
बैठता हूँ जब कलम लेके,उन बिसरी यादों को इन पन्नो पे सजाने को, तो कोई शब्द उपरोक्त नही लगता।
लगती हैं ये जिंदगी भी अब कम तुझे भूल जाने को
क्योंकि इस धधकते जिस्म पे अब कोई मुखौटा नही टिकता
मुखौटों की मियाद कम हो गयी हैं वक़्त के साथ
दिल का ये दर्द अब छुपाने पर भी नही छुपता
तेरे दामन में जगह मिल जाये सिर छुपाने को
इस उम्मीद का एक दिया भीतर जला रखा हैं
ना जाने कब नज़र पड़ जाए तेरी, इस उम्मीद के सहारे
इस जिस्म को लकड़ियों से बचा रखा हैं।
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