शहर

हर रोज़ ये भगता शहर सोता है सपनोंं की कब्र मैं
हर सुबह उढता है फिर से हज़ारों सपनों को बाहों में समेटे
दिन ढलते ढलते कुछ को ही पूरा कर पता है बस
हर शाम फिर से कब्र सज जाती हैं आलिंगन मैं लेने को
ये सोता नहीं, हर रात रिस्तो के गिरते मायिनो से तपन लेता है
जल जाता है हर क़तरा सुबह उसी गंध में सांस लेता है
सपनों की लड़ाई शुरू होती है ओर हर चेहरा कालिख़ से पूत जाता हैं।
लिए जले रिस्तो की खाक माथे पे सपनों की दौड़ में कही खो जाता है।
रौंदता चला जाता है अवषेशों को जो कल रात बच गए थे ज़मी पे जलने से
देखता है चारों तरफ तो खुद से ही खुद को घिरा पता है
पहुँच कर मंजिल पे अपनी फिर उन रिस्तो को ढूढ़ता है
झुठला आता हैं ठूकरा आता हैं जिन्हें
अपनी इसी मंज़िल को पाने के ख्वाब में।


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