सवाल

क्या वजह होगी, तेरे बार बार यूं खता हो जाने की?
खामोश बेरुखी से यूं बार बार लफ़्ज़ों को सुनने की?
तू भी बोल, तेरी खामोशियां तो इशारे बहुत करती है,
एक अर्से से आदत नहीं मुझे, ये सवाल बहुत करती है।
इन धुंधली यादों को, तेरे साथ का एक चश्मा चाहिए,
अंदाज़े अब काम नहीं आते, इन्हें अब तेरे अल्फ़ाज़ चाहिए।
याद हैं तो बस कुछ मेरी ज़िद और तेरा वो समझाना,
मुश्किल ही लगता है अब मेरा इन यादों से बच पाना।
मेरी जिद तुम्हें पीछे छोड़ आई, इंतज़ार रहा आने का,
किस्मत के आगे ज़ोर न चला था, फिर से तुझे पाने का।
बिछड़ कर भी तुझसे, कुछ धागे जुड़े हुए से लगते हैं,
उम्मीद के घर में, आज भी कुछ सपने तेरे ही दिखते हैं।
आओ, उन लम्हों को फिर से बुन लेते हैं हम मिल कर,
जंग नहीं यह जिंदगी है, आओ संवार लेते हैं इसे साथ मिल कर।

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