चित्त की आवाज़

जाओ चली जाओ अब कुछ नही बचा, सब जल गया उस रात आग में।।
अब ओर कुछ नही यहाँ जलने जलाने को।।
अध जले यादों के जिस्मों से उठती धुआँ में अब कुछ साफ भी नही दिखता।
इस धुयें के कारण ही अब यकीन मेरा, हर किसी पर नही बनता।
तुम्हारी कोई खता नही इसमें,मुझे ही टकराने की आदत थी बार बार।
इस धुयें ने आदत बदल दी अब, कदम आगे लेने से पहले भावनाओं को टटोलने की कोशिश एक बार जरूर करता हूँ।
कई बार सफलता मिलती हैं, कभी कभी गुरुर का सामना भी करता हूँ।
खुद ही खुद को झूठला देता हूँ, सच को नकार देता हूँ।
कई दफ़ा मांफी भी मांग लेता हूँ। उनकी नासमझी के लिए उन्ही से।
मैं तोह बस रिश्तों की कीमत समझता हूँ गुरुर तो मेरा भी किसी से कम नही।
शिकायत नही किसी से अब मुझे, इस धुंए में भी मैं अब खामोशी से साँस लेता हूँ।।।

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