समझाइस

ये पलकें भारी रहतीं हैं हर रात नींद से कोसों दूर थक कर मुझसे सवाल करतीं हैं!!!
क्यों उलझें रहते हों तुम इस मतलाबी दुनियां की बातों में क्यों खुद से इतने सवाल करते हों!
क्यों खुद से इतनी बातें करते हो,हर रोज़!!
कल खुद को कैसे छुपाना हैं दुनिया से,इसी का अभ्यास करतें हो!!
क्यों ख़ुद से इतना डरते हो!!
क्यों रोज़ रोज़ ये अभ्यास करतें हो!!
क्या मिला जो तुम्हारा नही हैं क्या खोया जो तुम्हारा था!!
सब पराया हैं! तुम ख़ुद,ख़ुद के नहीं एक वक़्त के बाद ख़ुद को पहचानने से इनकार कर दोगे!!

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