नारी दिवास की एक याद

एक महफ़िल में गया "नारी दिवस" आज जहाँ मनाया जाना था। लोगो को देखा संकल्प लेने दिलाने का रिवाज करते। सुकून मिलता दिल को,मगर हौंसला अवज़ाई और संकल्प दिलाने वाली एक महिला के शब्द सुनकर स्तभ् रह गया और अनायास कुछ पंक्तियों ने मेरे चित मन को घेर लिया। वही कुछ पंक्तियाँ आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ।








संकल्प अगर कोई लेना या दिलवाना ही चाहते हो तो बस इतना कह दो।
मेरी सहेलियों ज़रा आईना देखो।
ये बात कहता हैं भूत की जहाँ तूने युद्ध-ए-मैदान जीते हैं
ये कहानी सुनाता हैं वर्तमान की जहाँ तू आसमा तक जा पहुंची हैं।
ज़रा आईना देखो गौर से, देखो खुद को, और खुद को पहचानने की ज़हमत तुम कम से कम आज उढा लो।
जहाँ उपहास कर रहे नादान तेरा मर्दानी का चोला ओढ़ कर।
युद्ध भूमी की दहाड़ रह रही हैं आज गलियों,घरों की चीख बन कर।
नोंच रहे हैं गिद्ध तुझे समाज से कवच मर्द का लेकर।
पहचान ले तू खुद को आज इस से पहले की तू बन जाये इतिहास।
रह ना जाये कही तू बस बनकर, पीछे के एक बन्द कमरे से आती करहाने की आवाज़। 

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