खामोशी भरे जवाब

अहसास बयां करे जो हमारा,उन शब्दों को भीतर दबा लिया है हमने...
उन जीतने हारने के क़िस्सों से अब किनारा कर लिया है  हमने...
डरते हैं उन क़िस्सों से अब रूबरू होने से,उन क़िस्सों ने बहुत कुछ छीना है हमसे....
कुछ क़ीमती नहीं अब हमारे पास दाव लगाने को,ख़ुद को भी हम हार गये हैं तुमसे...पहली ही मुलाकात में..
घाव दिखाने से कतराना भी ठोकरों सेे सीखा हैं हमने...
अब तो ना पूछोगे शायद तुम भी कभी क्यों गुमसुम रहते हों...
हर वक़्त क्या है वो जो सोचते रहते हों....
क्यों आँखों मे लिए ढेरों सवाल हमें तकते रहते हो...
क्या है वो जिसे अपनी मुस्कुराहट से हर वक़्त ढकते रहते हो..

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