कविता लिखने का सफर

लोग कहते हैं मैं कविता लिखता हूँ।
ओर मुझे यकीन नही होता उनकी बातों पे
मैं तो बस मेरे नज़रिये से जन्मे ख्यालातों को उकेर देता हूँ सफेद पन्नों पे
शुरुआत भी हुई इसकी यू की जब ख्यालातों को सुनाने की कोशिश की तो जिसने समझा वो रो दिया।
जिसने ना समझा वो हँस दिया।
कुछ ने मशवरा देकर छोड़ दिया।
अब किसी से उम्मीद नही समझे जाने की ना ही कोई कोशिश हैं समझाने की।
बस इसलिए इन सफेद पन्नों को चुन लिया हैं।
चुप चाप सह लेते हैं बोझ मेरे खयालातों का।
इसलिए इन्हें ही हमसफर बना लिया हैं अब
उगता हैं जो भी डाल देता हूँ इनके कन्धों पे बस
अब मोहोब्बत सी हो गयी हैं इनसे
ऐसा हमराही ना मिलता शायद लाख ढूढ़ने पे
जो सुन लेता हैं मेरी कहानी और बदले में कुछ नही कहता
समा लेता हैं मेरे दर्द को अपने अंदर ओर तनिक भी शिकन नही लेता।

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