कल्पना: सहयोगनी को समर्पित
तुझसे मिला तो खुद से मिला हूँ मैं। की, जानने की कोशिश तुझे, तो खुद को जान पाया हूँ मैं। मुझे तो एहसास भी नही था, एक लेखक जी रहा हैं मेरे अंदर तेरी खूबसूरती से पहचान मिली मेरे खयालातों को। तू थी साथ तो लिख पाया मैं मेरे जज्बातों को। बेनाम था मैं इस दुनिया की भीड़ में।।। तेरा साथ मिला तो,नाम मेरा गूंज उठा खिताबी समारोहो में। तेरा ही हाथ हैं मेरे अंदर की खूबसूरती को और खूबसूरत बनाने में। मैं तो अनजान था मेरे अन्दर की खूबसूरती से। शुक्रिया मेरे अंदर की खूबसूरती से मुझे मिलाने के लिए। मेरे अंदर उठते नापाक इरादों को, अपने गुस्से से डराने के लिए, अपने आँसूओ से धोने के लिए, अपनी मुस्कान से झुकाने के लिए। मुझे पाक साफ बनाने के लिए। मेरे अधरों पे ये शब्द लाने के लिए। मुझे आम से ख़ास बनाने के लिए। मेरे नाम को पहचान दिलाने के लिए। मेरे नाम के अलावा भी, मैं बहुत कुछ हूँ, ये बताने के लिए। शुक्रिया,मेरे काम से मेरी पहचान करवाने के लिए। शुक्रिया, मुझे एक कामदार इंसान बनाने के लिए।