कत्ल की आज़ादी

यूँ तो 307 में सजा तुझे भी होनी थी।
तूने कई बार पलट पलट कर देखा जायजा लिया और हर बार एक ज़ोरदर वार किया।
दुख तो तुझे भी बहुत हुआ होगा तेरे हर वार के साथ मैंने मेरे लबों पे एक बूंद पानी की महसूस की थी।
सर्दियों का महीना था, तो बारिश भी नही थी आंसमा पे।
हमने तो कई किनारे देखे हैं तो तेरे कत्ल किये जाने का दुख तो था, मगर इतना भी नही की डूब जाएं यादें मिटाने को।
उस पल लगा वो आँसू ही होगा जो अधरों पे गिरा मेरे और जीने की वजहा दे गया।
तू चली गयी सुबहा होते ही और तूने पलट कर भी नही देखा।
कुछ सांसे यादों के सहारे मुठी में छोड़ गई थी तू।
तेरा कुछ था कीमती उसे भूल गयी थी तू।
उसने एक गर्मी सी दी औऱ बा किस्मत एक नीति ने जहाज से हाथ बढ़ाया, कुछ दिनों में होश आया।
मैं चला आया वहाँ से, शुक्रिया कहना भी भूल गया उसे।
मेरी बेरुखी शायद दुख दे गई उसे तो उसने भी मुझसे नाम नहीं पूछा।
ख़बर लगी तू खुश हैं उस वाखिये के बाद भी तो उन आँसूओ पे यकीन धुंधला सा हो गया एक पल मैं।
फिर लगा झल्लावा होगा दुनिया को
क्योंकि ये आँसू  गुन्हेगारो का साथ नही देते।
वक़्त गुज़रा और इंतज़ार रहा तेरी मुस्कुराहट के मलहम का।
मलहम तो लगाया तूने पर उस मलहम में वो बात न थी।
जिसकी मुझे उम्मीद थी।
मैं झल्लाया और वहाँ से चला आया एक बार फिर उसी जगह गया जहाँ आँसू चखे थे उम्मीद के।
और उसी तरह लेट गया जिस तरह तब लेटा था।
हर रोज़ उसी तरह वार किया खुद पे टटोला खुद को और फिर  उसी जगह पे वार किया।
इस बार ना आँसू था जो अमृत बन जाता और मेरे ही हाथों में इस बार खंजर था तो मुठी नही बाँध पाया।
नीति  को तो पहले ही रुष्ठ कर आया था।
एक बार तूने मुझे मारा और एक बार मैंने खुद, खुद को मारा
एक खुद खुशी का मुकदमा मुझपे भी है यँहा।
कही होते हैं गुन्हा सामाज के डर से तो कही नही भी होते।
लेकिन कत्ल होते ज़रूर हैं इस खुदगर्जी के वेग में।
कही मौत होती हैं शरीर की, तो कही रुहू की नवाज थम जाती हैं।
शरीर मरता हैं तो दिखता हैं दुनिया को।
मातम मनाते हैं गुस्सा दिखाते हैं लंझल लगाते हैं।
मरने ,मारने वालों की खूबियां,कमियां गिनाते हैं।
वरना होती हैं मौत इंसान की तो लोग जश्न मनाते हैं ग़ुरूर से छाती चोडाते हैं।
सज़ा नही है यहाँ कत्ल करने पे बशर्ते हथियार चुनने की कला होनी चाहिए।
थक गया है वो भी मुर्दों को मरते देख-देख के! 
कोई जिंदा हो तो इत्तला करनाl


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