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Showing posts from March, 2022

नसीहत; दास्ताँ

 दूर रहो अब ऐ मुझ पे उंगली उठाने वालों मै दरिया से लड़ कर अपनी रहा बनाने का हुनर सीख रहा हूँ मुझे जरूरत नहीं किनारों की मै समुद्र की तीखी लहरों पर चलना सीख रहा हूँ मेरे चरित्र पर प्रश्न चिन्ह लगाने वालों, दूर ही रहो अब ए दुनिया वालों मुश्किलों से लड़ते-लड़ते घाव हो जाना, छलावे से बस छिल जाने से अच्छे हैं,  आसाँ नहीं ये सब कर जाना बहुत मुश्किल होता है अपनों से मिले धोखे से उभर पाना  पर अब और ये सब नहीं, इसलिए मुझे मुनासिफ लगा खुद अकेले सफर तय करना  खूबसूरत हो ना हो सुकूं भरा बहुत है अकेले चलते जाना  काष्ठ की ज्वलनशील बैसाखी से बेहतर है खुद की रीड से बिना सहारे चलना  तो अब कोई चाहा नहीं किसी की गोद में सिर रखकर सोने की ना ही कोई ख्वाहिश ही रहीं अब दो वक्त के भी खाने की,  आदत हो गयी बाबस्ता अब तो बिना कुछ प्रतिक्रियाएं किए भूखे पेट सो जानें की उम्र कट गयी कुछ नादानी में, बाकी कट रहीं हैं आपके सहारे जिंदगी सीख जानें में  अब तो ख़्वाब भी नहीं बस कर्म से सवेरा, और धर्मशीला से शाम है यहि पारमिताये है और यही अनंत का मार्ग है बस मेरे जीवन का यही सार है

पर वो प्यार नहीं था

 तुम चुम्बन तो दिया करती थी पर ये प्यार नहीं था तुम गले तो लगती थी पर ये प्यार नहीं था हम घंटों रात रातभर बातें तो करते थे पर ये प्यार नहीं था कितनी ही बार हम लम्बी लंबी सैर पर निकल जाया करते थे पर ये प्यार नहीं था मै तुम्हारे लिए अपनी बैचेनी को बयां करता रहता था और तुम हँसती रहती थी तुम मुझे अपने दिन का लगभग हर किस्सा बताती थी  रात रात भर जगा कर अपने पुराने किस्से भी सुनती थी  पर ये प्यार नहीं था  तुम्हारे हर पल को खूबसूरत बनाने की मेरी हर कोशिशें तुम्हें बहुत पसंद आती थी पर ये प्यार नहीं था, क्योंकि की तुम्हारी ओर से इजहार नहीं था और  फिर एक दिन आय़ा जब तुम्हें कुछ याद नहीं था और  फिर वो दिन भी आय़ा जब तुमने कहा हमारे बीच कुछ नहीं था तुम्हारा कोई क़ुसूर नहीं इसमें, क़ुसूर बस मेरा है, मै ही ज़रूरत से ज्यादा मासूम था बस यही मेरा क़ुसूर था, तुम तो हमेशा से ही परिपक्व थी मै ही नादान था तुम्हारा कोई क़ुसूर नहीं सब मेरा क़ुसूर था अगर कभी ठगे भी जाओ मासूमियत के चलते  और इंसाफ अगर मांगोंगे  तो तुम्हें सिर्फ लानत और शर्मिंदगी मिलेगी  तो कल कोई मासूम...

The Speech I Couldn't Deliver

 The speech which I couldn't deliver on the day of the debate competition. The topic was  "Better opportunities in employment for women is the only way to achieve the goal of gender equality" I am very sure this topic is been decided by any man or society of men. Because I find it similar to the words "You will be only safe when you will go to school with your brother" "You will be only respectful when you will be learning households work and "silayi" "kadhai- bunnayi" etc. So you don't need to go to high school for higher education you will be only good here. It seems similar to me to those it doesn't, I must say they are innocent like my mother. The word " only ", when is been used anywhere with anything within any sentence frightened me and bound me to take a riot or make me rebellion somewhere, same as "Galileo" or might be other scientists who didn't believe in the theory of Italian Popes for cons...