पर वो प्यार नहीं था

 तुम चुम्बन तो दिया करती थी पर ये प्यार नहीं था

तुम गले तो लगती थी पर ये प्यार नहीं था

हम घंटों रात रातभर बातें तो करते थे पर ये प्यार नहीं था

कितनी ही बार हम लम्बी लंबी सैर पर निकल जाया करते थे

पर ये प्यार नहीं था

मै तुम्हारे लिए अपनी बैचेनी को बयां करता रहता था और तुम हँसती रहती थी

तुम मुझे अपने दिन का लगभग हर किस्सा बताती थी 

रात रात भर जगा कर अपने पुराने किस्से भी सुनती थी 

पर ये प्यार नहीं था 

तुम्हारे हर पल को खूबसूरत बनाने की मेरी हर कोशिशें तुम्हें बहुत पसंद आती थी

पर ये प्यार नहीं था, क्योंकि की तुम्हारी ओर से इजहार नहीं था

और 

फिर एक दिन आय़ा जब तुम्हें कुछ याद नहीं था

और 

फिर वो दिन भी आय़ा जब तुमने कहा हमारे बीच कुछ नहीं था


तुम्हारा कोई क़ुसूर नहीं इसमें, क़ुसूर बस मेरा है, मै ही ज़रूरत से ज्यादा मासूम था

बस यही मेरा क़ुसूर था, तुम तो हमेशा से ही परिपक्व थी मै ही नादान था

तुम्हारा कोई क़ुसूर नहीं सब मेरा क़ुसूर था

अगर कभी ठगे भी जाओ मासूमियत के चलते 

और इंसाफ अगर मांगोंगे 

तो तुम्हें सिर्फ लानत और शर्मिंदगी मिलेगी 

तो कल कोई मासूम इन सड़कों पर ना मिले तुम्हें तो खुद के ज़मीर को देखना कहीं तुम्हीं ने तो नहीं मारा उसे. 


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