नसीहत; दास्ताँ
दूर रहो अब ऐ मुझ पे उंगली उठाने वालों
मै दरिया से लड़ कर अपनी रहा बनाने का हुनर सीख रहा हूँ
मुझे जरूरत नहीं किनारों की मै समुद्र की तीखी लहरों पर चलना सीख रहा हूँ
मेरे चरित्र पर प्रश्न चिन्ह लगाने वालों, दूर ही रहो अब ए दुनिया वालों
मुश्किलों से लड़ते-लड़ते घाव हो जाना, छलावे से बस छिल जाने से अच्छे हैं,
आसाँ नहीं ये सब कर जाना बहुत मुश्किल होता है अपनों से मिले धोखे से उभर पाना
पर अब और ये सब नहीं, इसलिए मुझे मुनासिफ लगा खुद अकेले सफर तय करना
खूबसूरत हो ना हो सुकूं भरा बहुत है अकेले चलते जाना
काष्ठ की ज्वलनशील बैसाखी से बेहतर है खुद की रीड से बिना सहारे चलना
तो अब कोई चाहा नहीं किसी की गोद में सिर रखकर सोने की
ना ही कोई ख्वाहिश ही रहीं अब दो वक्त के भी खाने की,
आदत हो गयी बाबस्ता अब तो बिना कुछ प्रतिक्रियाएं किए भूखे पेट सो जानें की
उम्र कट गयी कुछ नादानी में, बाकी कट रहीं हैं आपके सहारे जिंदगी सीख जानें में
अब तो ख़्वाब भी नहीं
बस कर्म से सवेरा, और धर्मशीला से शाम है
यहि पारमिताये है और यही अनंत का मार्ग है
बस मेरे जीवन का यही सार है
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