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Showing posts from 2018

फना होने की चाह!

गुज़ारिश ऐ खुदा मुझे तू पाक कर दे,बादनाम गलियों में मेरी पहचान आम कर दे।।। इतना सा तू इन बादनाम गलियों में रह रहे अपने बच्चों पे अहसान कर दे!! हर रोज़ देखता हूं जहाँ आत्माओ कों जलते, गलते, कटते और मरते। देखता हूँ इन गलियों में तेरे कुद्दरत के नियमों को भी असहाय लगते!! सुनता हूँ धर्म के ढेकेदारो से तू भी इन गलियों से नज़रें चुरा लेता हैं अपनी जहाँ तेरे बच्चे हर रोज़ हैं बिकते। इन गलियों को जन्म देने वालों को देखा हैं मैंने अक्सर पूजते। तेरी बरकत से वो हैं,समाज में भगवान बने फिरते। ऐ खुदा अब इतना सा तू इन पे एहसान कर दे। मुझे पाक कर दे और इन गलियों में नीलाम कर दे।।  

the most loving soul

Dear, Dear, I am not ideal but i do care for you I am not good at things but I will never lie to you I have no muscular body but I will protect you I am not such clever but I will give my best to understand you I am not such humorous but I will keep trying to laugh you I am sensitive I will be rude, jealous, anguish but I will be sorry to you  May you will get better than me but still I will be loving you May you hate me you wouldn't like to see me ever But I'll keep loving you....

अवसर

                                    अवसर आया तो था मैं तुम्हारे पास मन में सवाल और अपनी बेचैनी साथ लिए आया तो था मैं तम्हारे पास अपने गहरे घावों को सहलाते हुए आया तो था मैं तुम्हारे पास मलहम लगाने की आस लिए आया तो था मैं तुम्हारे पास सुबकते हुए कदमो से, तेरे आँचल में कुछ सुकून के पल बताने के लिए आया तो था मैं तुम्हारे पास अपनी गलतियों गलतफमियो का इज़हार करने के लिए आया तो था मैं तुम्हारे पास तुम्हे कितना चाहता हूँ ये बताने के लिए कहाँ था तुम्हारे पास वक्त मुझे सुनने के लिए। तुमने हर बार मेरे पहले लव्ज़ पे मुझे टोक दिया। ठीक हैं ठीक है सब पता हैं मुझे कह कर हर बार तुमने दरवाजे से ही मुझे जाने को कह दिया। कई बार तो तुमने मेरे आने पे ही सवाल कर दिए। तुम्हारी अच्छाईयों के पन्ने लिखते वक्त स्याही खत्म हो गयी अब  नया अध्याय तुम्हारी बेचैनी, ग़ुरूर,अशांति से भरा है । मैं तो शुरू से ही भिखारी था प्यार का।। और तुम्हे, वो बना गया। आया तो था मैं तुम्हारे पास आज वक़्त ही वक़्त हैं तु...

मानव की क्रूरता ।।।। एक कविता मेरी डायरी से।।।।।

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एक कविता मैं अपनी डायरी से आपके साथ यहाँ साझा कर रहा हूँ। मैं एक स्त्री नही हूँ अतः उसके दर्द को शायद उतनी भलीभाँति बयां ना कर पाया हूँ। इसे मेरी एक कोशिश समझ के स्वीकार करे व अपनी टिप्पणी के माध्यम से अपने विचारो से मुझे अवगत कराएं।

बेरंग सी हैं ज़िन्दगी

बेरंग सी हैं ज़िंदगी  बेरंग सी हैं ज़िन्दगी आँखों से बहती हैं हर खुशी यादों ने छुपा के रखी थी जो कही आहहह बेरंग सी हैं ज़िन्दगी हां आँखों से बहती हैं हर खुशी  ढूंढ के ला वो वजह तो ज़रा, वो गुनहा तो बता जिसकी मिली हैं मुझको आज ये सजा।। उसके आँचल तले कटे ये ज़िन्दगी सारी, इतनी सी थी मेरी इल्तज़ा तुझसे ऐ खुदा।। क्यों दिखाई तुने मुझसे इतनी बेरूखी ये बता क्यों भरा तूने ये रंग, क्यों मिली हैं मुझकों ये सजा।।। क्या चाहत बेपनाह देखी हैं तूने कही उसके लिए तोह बता।। बे रंग सी हैं ज़िन्दगी!! यूँ खामोश दिल ये कब तक सहे यादों के वो घाव जिनकी इस दुनिया में नही हैं कोई दावा।। सजा के रखू इन घावों को या में बह जाऊ तेरी बेरुखी के साथ इतना तो बता बेरंग सी है जिंदगी  क्या रखू में तुझसे इंसाफ की उम्मीद अब इन काले रास्तों से जो मिलाया है तूने मुझे इस कदर  क्या इंसाफ की उम्मीद रखूं ओर जाऊँ किस डगर  बन जाऊँ रंगरेज भूला दूँ तस्वीर तेरी और मिटा दूँ में उसके भी निशा।। भर दूँ तेरी बक्शी इस जिंदगी में वो रंग  तू भी देख कर कतरा जाए कि मेरे जीने ये ढंग  रंग दूँ लाल ये ज़मी, भ...