अवसर

                                   अवसर



आया तो था मैं तुम्हारे पास
मन में सवाल और अपनी बेचैनी साथ लिए
आया तो था मैं तम्हारे पास
अपने गहरे घावों को सहलाते हुए
आया तो था मैं तुम्हारे पास
मलहम लगाने की आस लिए
आया तो था मैं तुम्हारे पास
सुबकते हुए कदमो से,
तेरे आँचल में कुछ सुकून के पल बताने के लिए
आया तो था मैं तुम्हारे पास
अपनी गलतियों गलतफमियो का इज़हार करने के लिए
आया तो था मैं तुम्हारे पास
तुम्हे कितना चाहता हूँ ये बताने के लिए
कहाँ था तुम्हारे पास वक्त मुझे सुनने के लिए।
तुमने हर बार मेरे पहले लव्ज़ पे मुझे टोक दिया।
ठीक हैं ठीक है सब पता हैं मुझे
कह कर हर बार तुमने दरवाजे से ही मुझे जाने को कह दिया।
कई बार तो तुमने मेरे आने पे ही सवाल कर दिए।
तुम्हारी अच्छाईयों के पन्ने लिखते वक्त स्याही खत्म हो गयी अब 
नया अध्याय तुम्हारी बेचैनी, ग़ुरूर,अशांति से भरा है ।
मैं तो शुरू से ही भिखारी था प्यार का।।
और तुम्हे, वो बना गया।
आया तो था मैं तुम्हारे पास
आज वक़्त ही वक़्त हैं तुम्हारे पास।
और मुझे। जिसे जरूरत थी मेरी उसने गले लगा लिया।
अब ये मुझे छोड़ता नही।।
  और जाने भी नही देता कही।
कैद तो नही हूँ मैं। पर इसकी बेइंतहा मोहम्मद मुझे जाने की इजाजत नही देती।





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