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नादान इंसान

इस इंसान ने क्या क्या नही बनाया । ऊंची इमारते , सड़के, महल, शहर । इन्हें अपने भरसक प्रयासों से सजाया, आकर्षित बनाया । फिर जो बिक सकता था, उसे दुकानों में सजाकर बेच डाला। मन, शरीर और ज़मीर, खरीददारों ने इन्हें भी ख़रीद डाला। क्या खोज रहे हो, यँहा सब मिलता हैं, सब बिकता हैं । सही जगहां का पता चाहिए? अरे हाँ ! वो भी बिकता हैं। किस आग को भुजाने आये हो, किस मर्ज की दावा खोजने आये हो। धर्म की शिक्षा से आग नही भुजी क्या? जो खुद को और जलाने आये हो। खैर कोई बात नही यँहा "वो" भी बिकता हैं, तुम्हारी इक्छानुसार विवेचन के साथ मिलता हैं। धन की लालसा लिए, अधिकाधिक धन कमाने के मार्ग खोजने आये हो? अरे हाँ भाई! ये भी मिलता हैं, दस-दस पन्नों की किताबों में अनुभव विवरण के साथ बिकता हैं। कही कोई और कारण तो नही यँहा आने का? कोई ख्वाहिश हो जिस्मानी या नशे की आदत हो, यँहा सब मिलता हैं। यँहा सब बिकता हैं।  नादां इंसा बेच रहा हैं, खुद को बाजार लगाकर क्या पाया अंत में अपने अंदर के जानवरो को खिलाकर बेचैन मन और बीमारी ही बीमारी। कभी भाई से तो कभी पड़ोसी से युद्ध की तैयारी। क्या पाया अन्त में दो गज़ ज़मी , शव श...