रिस्ते लिबास नही होते

क्या करे मोह्तार्मा रिस्ते लिबास नही होते..
जो एक पल में उतार कर फेंक देते..
होते भी हैं अगर आपके हिसाब से..
तो हमे उन तमाम लिबासों से मोहबत है बेइंतहां जो तुम्हारी यादो के धागो से बुने हैं और....
जिन पे धब्बे हैं तुम्हारे शिकवें शिकायतो के..
उन धब्बों को धोने की कोशिश की है जब जब..
तब तब हमारी उन कोशिशों ने उन्हें और गहरा बना दिया शायद..
तभी तो मांग लिया तुमने हमसे आज हमारी साँसों का सहारा वो मफलर तुम्हारा जो तुम भूल आयी थी..
उस किनारे पे जहां हमने वो सर्द रात बितायी थी..
अनजान से बैढे थे उस वक़्त,,वक़्त का कुछ पता ही ना लगा..
कब हम-तुम साथ हो लिए और इतने लम्बे चल आये
की आज रास्ते अलग-अलग हो लिए..

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