पैग़ाम

पैगाम

मांस के लोथड़ों की कमी नही हैं शहर में।।
कोड़ियों के दाम बिकते हैं।।
इश्क़ किया था हमने तुमसे....
चाहत बस जिस्मानी होती कोई, तोह हम भी जेब टटोल लेते अपनी...
उन बाज़ारों से हम भी खरीद लेते सुकून अपना....
अगर सुकून कोई बेच रहा होता वहाँ पे...,,,तो
ज़ख्मो से पीड़ितो की आवाज़ ना आती,माहौले के उस कोने से हर रोज़।
भरे माहौले में तूने इश्क़ को मेरे काफिस में खड़ा कर डाला।।
पहना कर मेरे इश्क़ को हवस का चोला...
मेंरे पाक इश्क़ को तूने नापाक कर डाला।।
वफाई का ताज हर किसी के सर पर नही फब्ता।
शुक्र हैं एहसास हैं मुझे इसका।
नही तोह बाहर का ये नज़ारा कुछ और ही होता।
तू रो कर भी ना छुपा पाती अपनी प्यास को।
जो हैं हश्र मेरा तेरा उस से भी बुरा होता।।
अगर में बेवफा होता।

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