धर्म

कुछ पत्थरों पे राम लिखा था और कुछ पे अल्लहा।
मैं बेघर बेचारा क्या करता चुग लिए पत्थर सारे
और बना लिया आसिया अपना।
मेरे ही जैसे दो बेचारे भटक गए थे रास्ता अपना।
एक था वाहेगुरु और एक था ईशु माता मरियम का बच्चा।
बना लिया उन्होंने भी मेरे ही आसिया को ढिकाना अपना।
रह रहे हैं चारो अब, एक ही छत के नीचे औऱ निभा रहे हैं
धर्म अपना अपना।
भोजन चार पहर बनता हैं एक ही आंगन में, कभी शाकाहारी तो कभी मांसाहारी एक पहर सर्वाहारी भी पकता हैं।
शाम को मधुरस पान का दौर भी चलता हैं।
नॉकारी ज्यादा कमा कर नही देती, बर्तनों की कमी हैं घर में फिर भी मिल बाँट कर चला लेते हैं काम अपना अपना।
एक पहर का भोजन तो मिल ही जाता हैं
हर वक्त रूखा सूखा ही सही पर कुछ ना कुछ तो आगंतुकों को दे ही दिया जाता हैं।
पैगम्बर हो फरिस्ता हो या दूत आने वाले हर शख्स का मान रख लिया जाता हैं।।
रह रहे हैं चारों ईश्वर, ईशु, गुरु और अल्हा।
मालिक को याद चारों पहर किया जाता हैं घर में
कभी याद करता हैं ईश्वर कभी ईशु कभी गुरु तो कभी अल्हा।
एक पहर पूजा जाता हैं राम, तो दूजे पहर इबादत करता हैं अल्हा, तीजे पहर गुरुबाणी तो रहता हैं आलम, चौथे पहर प्रेयर की खामोशी का।
जगह कम हैं घर में, बना रखा हैं एक ही कोने को मन्दिर,मस्जिद,गिरजाघर,गुरुद्वारा अपना।
रह रहे हैं साथ सब और निभा रहे हैं। धर्म अपना अपना।
इंसानियत ही बन गया हैं अब इन सबका धर्म अपना।।

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