तुम!

तुम ही किताब हो मेरी, बस तुम्हे ही पढ़ना चाहता हूँ।
तुम इम्तिहान भी हो मेरा, जिसे मैं पास करना चाहता हूँ।
तुम भूत में भी हो मेरे, जिसे मैं कभी भूलना नही चाहता हूँ।
तुम वर्तमान में भी हो मेरे, जिसे मैं हर वक्त अपनाता हूँ।
तुम भविष्य में भी रहो मेरे, बस इतना ही चाहता हूँ।
 
शायद खुद की कद्र नही तुम्हे, शायद खुद से प्यार नही तुम्हे।
इसलिए ही तो मैं हर बार ठुकराया जाता हूँ।
हर बार ठुकराया जाता हूँ, कुछ नया सिखकर फिर से तेरे पास ही लौट आता हूँ।
जो तेरे साथ स्वप्न देखे वो देखूँ किसी और के साथ, वो स्वप्न कभी पूरे नही कर पता हूँ।
इसलिए फिर से हर बार की तरह तेरे पास चला आता हूँ।
इस अनजान सफर का भटका राहगीर बन कर रह जाता हूँ।
तेरे अलावा इस पथ पर साथी किसी और को नही बना पता हूँ।
 
कब पूर्ण बनूँगा तेरे लिए नही जनता, जँहा जिसमे तुझे देखूं बस तुझे ही पता हूँ।

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