दर्द-ए-प्याले; शायरी
(1)
मेरे शब्द और तीखे नही हुए थे , पिछली मर्तबा से।बस माफी के खत इस दफा, तुम्हारे नाम जरूरत से ज्यादा थे।तुम गुन्हा भी कर देती थी तो तुम्हारे हिस्से दर्द नही था।हम दर्द में कभी उफ्फ भी कर दिया करते थे , तो उसका कोई कारण नही था।कब्र तो हम दोनो ने मिलके खोदी थी इस रिश्ते की ।इसके ख़तबे पे ज़हर ए नाम सिर्फ हमारा क्यों था।मन के मिज़ाज़ का मसला हैं ज़नाब, नही तो लोग यूँ दूसरों का हक़ ना छीना करते।बात सिर्फ पेट की ही होती, तो आधी में भी गुज़र कर लेते!
(2)
जो लोग थे अपने,वो पराये हो गए हैं
जो शौक थे पराये,वो अपने हो गए हैं
इस मांसल हड्डियों के ढांचे को हर पल जला रहे हैं
एक बुझती नहीं है कि उसी से दूसरी सुलगा रहे हैं
जो शौक थे पराये,वो अपने हो गए हैं
इस मांसल हड्डियों के ढांचे को हर पल जला रहे हैं
एक बुझती नहीं है कि उसी से दूसरी सुलगा रहे हैं
(3)
एक रात जब थक गए इंतजार कर के, तो ली बोतल शराब की और इस जिस्म में उड़ेल डाली
मन हल्का नहीं हुआ उससे भी तो वो खाली बोतल दीवार पर टंगी उसकी तस्वीर पे दे डाली
कर्कश साँसे गला चीरती रहीं फिर भी, सुकून देने को ये कहाँ राज़ी थी,
ज़मीं पर पड़े काँच के टुकड़े से, ये नवज काट डाली और
ख़ुदा की बख़्शी ये खैरात की जिंदगी फिर से उसी को दे डाली
मन हल्का नहीं हुआ उससे भी तो वो खाली बोतल दीवार पर टंगी उसकी तस्वीर पे दे डाली
कर्कश साँसे गला चीरती रहीं फिर भी, सुकून देने को ये कहाँ राज़ी थी,
ज़मीं पर पड़े काँच के टुकड़े से, ये नवज काट डाली और
ख़ुदा की बख़्शी ये खैरात की जिंदगी फिर से उसी को दे डाली
(4)
ये इश्क है, आबिद अगर सच्चे हो तो यहाँ हार नहीं होती.
हर हाल में जीतता ही है, इबादत उसकी की हो, तो मुशरिक भी हाथ चूमता है.
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