ये उम्मींद!

ये उम्मीद क्यूँ खत्म नहीं होती उसके लौट आने की

की उनकी यादों में लिपटे जिस्म के हर हिस्से को हम जला के बैठे है

उन्हें भुलाने के हर मुमकिन रास्तो पर हम हार के बैठे है

मौत एक मुमकिन रास्ता लगता था

उन इरादों में भी हम नाकाम होकर बैठे है

की ये उम्मीद खत्म क्यूँ नहीं होतीं 

अब तो हम सब जला कर बैठे है

उनकी सब हिदायतों का उल्लंघन कर के बैठे हैं 

वो भी उन तमाम आने के रास्तों पर ताला लगा के बैठे है

और इसकी जानकारी हमे देकर निश्चित होकर बैठे हैं 

की ये प्यास कब बुझेगी, की ये उम्मीद कब खत्म होगी, इसी उम्मीद में, 

बंद कमरे में बेहिसाब खाली बोतलों से घिरे बैठे है 

इतला कर दिया उन्होंने हमे कई मर्तबा वो इश्क नहीं, बस बचपन की नादानी थी

फिर भी उन्हें आज तक साथ लिए बैठे हैं 

टुकड़ों में बिताए सफ़र को अब तक गले से लगा के बैठे है

जिस्म का हर हिस्सा उसकी यादों में लिपटा है, ज़िक्र हो ही जाता है जाने अनजाने, अब 

हर दर्द, गम को सिगरेट के धुएँ, शराब और मुस्कराहट से ढक कर बैठे है

की ये उम्मीद खत्म क्यूँ नहीं होती 

अब तो हम सब जला के बैठे है


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