जिंदगी
क्या गुनहा किया मैंने ए ज़िन्दगी की तू इतनी खफा हो गयी।
साँस लेना भी अब तो एक सज़ा हो गयी।
चंद दफ़ा झूठ बोला होगा मैंने बस,प्यार पाने के लिए
डांट से बचने के लिए, मुझसे ऐसी भी क्या भूल हो गयी।
जो सुंकूँ की नींद भी अब दूर हो गयी।
ए ज़िन्दगी मुझसे ऐसी क्या ख़ता हो गयी
जो तू इतनी खफा हो गयी।
कुछ दो चार मर्तबा, माँ के बटुये से अठन्नी चुराके
कुल्फी खायीं थीं।
इस गुस्ताखी की तो मांफी भी मांगी थी मैंने हर दफा।
फिर ए ज़िन्दगी तू इतनी क्या नाराज़ हो गयी
अब अस्सी रूपए की कुल्फी से भी वो स्वाद ले गयी।
ए जिंदगी तू कब इतनी परायी हो गयी।
की साँस लेना भी अब सजा हो गयी।
-दीपक कुमार
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